
नसीरुद्दीन शाह ने जामिया छात्रों का समर्थन किया, खुद को 'दिमागी नक्सल' घोषित किया
क्या हुआ?
एक भावुक वीडियो में, नसीरुद्दीन शाह ने जामिया मिलिया इस्लामिया और अन्य संस्थानों के छात्रों के प्रति सरकार के व्यवहार की आलोचना की, खुद को 'दिमागी नक्सल' कहा। उन्होंने असहमति रखने वालों के खिलाफ इस्तेमाल किए गए लेबल की निंदा की।
मुख्य बिंदु
- नसीरुद्दीन शाह ने एक वीडियो में खुद को 'दिमागी नक्सल' कहा, जिसमें उन्होंने छात्रों के प्रति सरकार के दमन की आलोचना की।
- उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया, जेएनयू और एसआरएफटीआई के छात्रों के प्रति व्यवहार की आलोचना की।
- शाह ने सरकार को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' कहा और युवाओं के खिलाफ उसके कार्यों पर सवाल उठाया।
- उन्होंने प्रतिरोध के अपने संदेश को मजबूत करने के लिए क्रांतिकारी कविता का पाठ किया।
- शाह ने असहमति को दबाने में मीडिया और बीजेपी की आईटी सेल की भूमिका की निंदा की।
मुख्य अंतर्दृष्टि
- शाह की घोषणा सरकार की नीतियों के खिलाफ आगे की छात्र सक्रियता को प्रेरित कर सकती है।
- असहमति रखने वालों के खिलाफ प्रतिक्रिया बढ़ सकती है, जिससे राजनीतिक परिदृश्य प्रभावित होगा।
- उनकी क्रांतिकारी कविता का उपयोग वर्तमान संघर्षों से ऐतिहासिक प्रतिरोध को जोड़ता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
शाह की टिप्पणियाँ भारत में छात्र अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में चल रही चिंताओं को उजागर करती हैं।
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स्रोत
India Today

